बार में आए दिन होते है झगड़े
पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
राजपुर रोड पर पूरी रात खुले रहे है पब व बार
देहरादून। नशा हर बुराई की जड़ होता है लेकिन राजधानी देहरादून में संचालित होने वाले शराब की बार में पुलिस की अनदेखी के चलते रातभर नशा परोसा जा रहा है। जिसके कारण आए दिन बार में झगड़े होते रहते हैं। इन झगड़ों को रोकने के लिए बार में बाउंसरों की तैनाती की जाती है। देहरादून में हरियाणा, उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर व सहारनपुर के होटल, बार, पब, निजी शिक्षण संस्थान, औद्योगिक प्रतिष्ठान तथा बड़े निजी आयोजनों में बाहरी राज्यों के सुरक्षा कर्मियों की तैनात रहते हैं लेकिन कभी पुलिस इनका सत्यापन नहीं करती है। पुलिस की अनदेखी के चलते ही गत दिवस रिटायर ब्रिगेडियर की गोली लगने से हत्या हुई है। क्योंकि पुलिस गली मुहल्लों में तो बड़े-बड़े सत्यापन अभियान चलाने का दावा करती है लेकिन हर जमीन व बार की झगड़ों में शामिल होने वाले बाउंसरों के सत्यापन की अनदेखी करती है। क्योंकि बार संचालक बड़े-बड़े अधिकारियों तक पहुंच रखते है।
प्रदेश में लगातार बढ़ते आपराधिक मामलों के बीच एक चिंताजनक तथ्य सामने आया है। बाहरी राज्यों से आने वाली सिक्योरिटी एजेंसियों, बाउंसरों एवं व्यक्तिगत सुरक्षा कर्मियों के शस्त्रों के सत्यापन को लेकर व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। सुरक्षा विशेषज्ञ इसे राज्य की आंतरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील मुद्दा मान रहे हैं। जानकारी के अनुसार होटल, बार, पब, निजी शिक्षण संस्थान, औद्योगिक प्रतिष्ठान तथा बड़े निजी आयोजनों में बाहरी राज्यों के सुरक्षा कर्मियों की तैनाती तेजी से बढ़ी है। ऐसे में उनके शस्त्र लाइसेंस, एजेंसी पंजीकरण, चरित्र सत्यापन एवं शस्त्रों की वैधता की नियमित जांच अनिवार्य हो जाती है। यदि इस प्रक्रिया में शिथिलता बरती जाती है तो असामाजिक तत्वों के लिए व्यवस्था का दुरुपयोग करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
सूत्रों के अनुसार यह भी सामने आया है कि कतिपय व्यक्तियों ने अन्य प्रदेशों से जारी शस्त्र लाइसेंस के आधार पर उत्तराखंड में शस्त्रों का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि वैधानिक प्रावधानों के तहत ‘ऑल इंडिया’ लाइसेंस धारक राज्य में शस्त्र उपयोग कर सकता है, लेकिन अन्य मामलों में लाइसेंस की सीमा, वैधता और संबंधित अनुमति की गहन जांच आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना समुचित सत्यापन के अन्य राज्यों के लाइसेंस का उपयोग सुरक्षा तंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
प्रशासनिक स्तर पर अब इस पूरे तंत्र की समीक्षा की आवश्यकता जताई जा रही है। जानकारों का मानना है कि सभी बाहरी सुरक्षा एजेंसियों एवं कर्मियों का डेटा स्थानीय पुलिस अभिलेखों में अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए तथा समय-समय पर भौतिक सत्यापन और दस्तावेजों की पुनः जांच सुनिश्चित की जाए।
प्रदेश में बढ़ते अपराधों की पृष्ठभूमि में यह मुद्दा सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। कड़े सत्यापन और निगरानी व्यवस्था से ही संभावित जोखिमों को समय रहते रोका जा सकता है।
बाहरी के फर्जी शस्त्र लाइसेंस को वैध करने के गिरोह का भी हुआ था पर्दाफाश
देहरादून। एसटीएफ ने बाहरी राज्यों के फर्जी तरीके से शस्त्र लाइसेंस को उत्तराखण्ड में वैध कराने के नेटवर्क का भंडाफोड किया था आरोपी ने फर्जी तरीके से शस्त्र लाइसेंस संख्या-3805 तैयार कराया। इसे पहले हरियाणा के सिरसा से मेरठ में ट्रांसफर दिखाया, यानी रिकॉर्ड पर चढ़वा दिया। फिर 2020 में इसे मेरठ से ट्रांसफर करवाकर देहरादून जिला कार्यालय में दर्ज करा दिया। जब एसटीएफ ने सिरसा प्रशासन से संपर्क किया तो पता चला कि वहां से ऐसा कोई लाइसेंस कभी जारी ही नहीं हुआ था। बाहरी राज्यों में बने फर्जी शस्त्र लाइसेंस को उत्तराखंड में वैध कराने का खेल चल रहा है। लेकिन इसके बाद भी दून पुलिस ने कोई सबक इस घटन से नहीं लिया था जिसके कारण आए दिन अपराधों की घटना में बढ़ोतरी रही है।

